अभ्यास :- गहरा पूरक करें और श्वास रोकें। हाथों को घुटनों पर रखें, कंधों को ऊंचा करें और धड़ को थोड़ा सा आगे झुकायें। मूलाधार चक्र पर ध्यान दें और दृढ़ता से गुदा मांसपेशियों को सिकोड़ें। > मांसपेशियों का सिकुडऩ और श्वास को यथासंभव और सुविधाजनक स्थिति तक रोकें। > लम्बा रेचक करते हुए प्रारंभिक स्थिति में लौट आयें। > सामान्य श्वास के साथ कुछ देर तक इसी स्थिति में बने रहें। लाभ :- गुर्दे की श्रोणी सतह मजबूत करता है। बवासीर दूर करता है और किडनी की श्रोणी क्षेत्र में संक्रमण को कम करता है। यह स्वायत्त नाड़ी तंत्र को शान्त करता है और मन को शांत व तनाव रहित बनाता है। आध्यात्मिक स्तर पर, मूल बंध मूलाधार चक्र को सक्रिय और शुद्ध करता है। यह सुप्त चेतनता और कुंडलिनी शक्ति को जागृत करता है। सावधानी : मूल बंध का दीर्घकालीन और गहन अभ्यास "दैनिक जीवन में योग" के एक अनुभवी अनुदेशक के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए।
जालंधर बंध :- ऐसा माना जाता है कि इस बंध का अविष्कार जालंधरिपाद नाथ ने किया था इसीलिए उनके नाम पर इसे जालंधर बंध कहते हैं। हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता में इस बंध के अनेक लाभ बताएँ गए है ं। कहते हैं कि यह बंध मौत के जाल को भी काटने की ताकत रखता है, क्योंकि इससे दिमाग, दिल और मेरुदंड की नाड़ियों में निरंतर रक्त संचार सुचारु रूप से संचालित होता रहता है। विधि : किसी भी सुखासन पर बैठकर पूरक करके कुंभक करें और ठोड़ी को छाती के साथ दबाएँ। इसे जालंधर बंध कहते हैं। अर्थात कंठ को संकोचन करके हृदय में ठोड़ी को दृढ़ करके लगाने का नाम जालंधर बंध है। इसके लाभ : जालंधर के अभ्यास से प्राण का संचरण ठीक से होता है। इड़ा और पिंगला नाड़ी बंद होकर प्राण-अपान सुषुन्मा में प्रविष्ट होता है। इस कारण मस्तिष्क के दोनों हिस्सों में सक्रियता बढ़ती है। इससे गर्दन की माँसपेशियों में रक्त का संचार होता है, जिससे उनमें दृढ़ता आती है। कंठ की रुकावट समाप्त होती है। मेरुदंड में ख...
योग का एक नियम है कि प्रत्येक मांसपेशी एक दिन में कम से कम एक बार गतिशील अवश्य हो। इससे हमारी ऊर्जा पुन: प्रवाहित होने लगती है और रुकावटें दूर होती हैं। ऊर्जा पानी के समान है। जो पानी एक जगह ठहरा रहता है वह अशुद्ध और दुर्गंधयुक्त हो जाता है। इसके विपरीत, जो पानी बहता रहता है हमेशा शुद्ध रहता है। यही कारण है कि हमें भी अपने पेट की मांसपेशियों और आंतों को रोजाना गतिशील करना चाहिये। नौलि अति प्रभावी रूप से पाचन में सहायक है और इस प्रक्रिया में आने वाली रुकावटों को दूर करती है। प्रारंभिक व्यायाम विधि : पैरों को थोड़ा सा खोलकर खड़े हा जायें। > नाक से गहरा पूरक करें। > घुटनों को थोड़ा मोड़ते हुए दोनों हाथों को जांघों पर रखकर मुख से पूरी तरह रेचक करें। > बाजुओं को सीधा करें। पीठ सीधी है, सिर तना हुआ। पेट की मांसपेशियों को विश्राम दें। > अब बिना श्वास लिए पेट की दीवार (चर्म) को ताकत के साथ और जल्दी-जल्दी 10-15 बार अन्दर-बाहर करें। > नाक से पूरक करें और फिर तनकर सीधे खड़े ह...
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