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वस्त्रधौति

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                   वस्त्रधौति क्या है? ‘वस्त्र’ का अर्थ है कपड़ा। पेट एवं भोजन नली को कपड़े से साफ करने की क्रिया वस्त्रधौति है।  वस्त्रधौति एक अत्यंत लाभकारी शोधन योग क्रिया है जो पुरे शरीर को साफ करते हुए शरीर से विषैले पदार्थ को बाहर निकालने में मदद करता है। शरीर से हानिकारक पदार्थ को वस्त्र के मदद से निकाला जाता है। वस्त्रधौति की विधि :- सबसे पहले आप बारीक मुलायम सूती कपड़े का तीन से छह इंच तक चौड़ा और आठ गज लंबा टुकड़ा लें। कपड़े को पानी और साबुन से अच्छी तरह से धो लें। उसके बाद इसे पांच मिनट तक पानी में उबालें। कागासन में बैठें। मुंह को पूरा खोलकर कपड़े का एक सिरा गले के भीतर ले जाएं, दूसरा सिरा जीभ पर फैलाएं और अंगुलियों को इस तरह बाहर लाएं कि कपड़ा उसी तरह रहे। जीभ हिलाकर कपड़े को धीरे-धीरे निगलना आरंभ करें। यदि कपड़ा गले में फंस जाता है और नीचे नहीं जाता है तो एक घूंट गर्म पानी पी लें किंतु अधिक पानी नहीं पिएं क्योंकि पेट में कपड़ा भरना है, पानी नहीं। कपड़ा निगलते रहें और वमन नहीं होने दें। जब दो-तिहाई कपड़ा नि...

जल नेति

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                         जल नेति नमकीन पानी के साथ नेति तकनीक : विशेष रूप से बने हुए बर्तन, नेति-पात्र, को गरम नमकीन पानी से भर लें। पानी का तापमान 38-40 सेन्टीग्रेड हो व उसमें 1 लीटर पानी में लगभग 1 चाय का छोटा चम्मच नमक मिला हो।* सिर को धोने के पात्र (जैसे टब) के ऊपर झुकाएं और आहिस्ता से नेति-पात्र की नली को दायें नथुने में डाल दें (जिसके फलस्वरूप नथुना बंद हो जाता है।) सिर को थोड़ा आगे मोड़ें और इसी समय सिर को बायीं ओर झुकाएं जिससे पानी बायें नथुने से बाहर निकल जाये। खुले मुख से श्वास लेते रहें। दायें नथुने से नेति-पात्र में भरा लगभग आधा पानी बहा दें। अब आहिस्ता से नेति-पात्र की नली को बायें नथुने में डालें और सिर को दायीं ओर झुकाएं, जिससे पानी दायें नथुने से बाहर निकल जाये। जब यह क्रिया समाप्त हो जाए तब कपाल-भाति-प्राणायाम तकनीक से दोनों नथुनों से अवशिष्ट पानी बाहर निकाल दें। नाक के शुद्धिकरण को पूर्ण करने के लिए, एक नथुने को बंद करके दूसरे नथुने से 3-5 बार प्रत्येक नथुने से जोर से श्वास बाहर न...

क्रिया का मतलब

क्रिया का मतलब : क्रिया योग की यह विशेषता है कि इसमें ध्यान के लिए मन को नियन्त्रित करने की आवश्यकता नहीं रहती है। इसमें सर्व प्रथम आँखें खुली रखते हुए मन को मनमानी करने की छूट दी जाती है। मन की गति को सिर्फ साक्षी भाव से देखा जाता है। अन्ततः मन धीरे-धीरे स्वयं शान्त होने लगता है। जैसे ही मन शान्त हो जाता है, वैसे ही साधक ध्यान की स्थिति में पहुँच जाता है। मगर इस  क्रिया योग (Kriya Yoga)  की साधना में अन्य कई प्रकार के अभ्यास भी जोड़ दिये गये हैं। इसमें  आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बन्ध  तथा  हठयोग  कई कठिन क्रियाएं भी शामिल हैं। कुल मिलाकर  क्रिया योग (Kriya Yoga)  की तैयारी काफी कठिन है- भले ही इसकी साधना को सरल रूप में चित्रित किया जाय। इस साधन में यह भी माना जाता है कि इस  क्रिया योग (Kriya Yoga)   के अभ्यास से मूलाधार में प्रसुप्त कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है और इसके दिव्य अनुभव साधक को प्राप्त होते हैं। यह भी माना जाता है कि  इस ‘क्रियायोग’ से हर प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोग भी ठीक हो जाते हैं योग मे...

नियम

अष्टांग योग का दूसरा चरण  : नियम  महर्षि पतंजलि के योग सूत्र का दूसरा चरण नियम है | पहला चरण यम जहा मन को शांति देता है , वही दूसरा चरण नियम हमें पवित्र बताता है |   नियम के भी पांच प्रकार होते हैं : शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय (मोक्षशास्त्र का अनुशलीन या प्रणव का जप) तथा ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर में भक्तिपूर्वक सब कर्मों का समर्पण करना)। आसन से तात्पर्य है स्थिर और सुख देनेवाले बैठने के प्रकार (स्थिर सुखमासनम्‌) जो देहस्थिरता की साधना है।  नियम : जीवन में पवित्रता  योग दर्शन में शौच,संतोष,तप,स्वाध्याय,व ईश्वर प्रणिधान को नियम कहते है. यह पांच नैतिक नियम है, जो हमारे अंदर की कलुस्ता (गंदगी) को दूर करते हैं, और हमें योग मार्गी जीवन जीने के लिए एक स्वच्छ और बेहतर शरीर प्राप्त करने में मददगार साबित होते हैं क्योंकि जब तक हम शारीरिक रूप से स्वस्थ और स्वच्छ नहीं रहेंगे तब तक हम योग मार्ग पर सफलता प्राप्त नहीं कर सकते हैं . नियम पांच प्रकार के होते है - शौच :- शौच का अर्थ पवित्रता या सुचिता है.पवित्रता दो तरह की होती है – बाह्य व आभ्यंतर . मिट्टी या जल स...

यम

अष्टांग योग का परिचय अष्टांग योग महर्षि पतंजलि के अनुसार “योगश्चितवृत्तिनिरोध:” चित्तवृत्ति के निरोध का नाम योग है | इसकी स्थिति और सिद्धि के निमित्त कतिपय उपाय आवश्यक होते हैं जिन्हें ‘अंग’ कहते हैं और जो संख्या में आठ माने जाते हैं। अष्टांग योग के अंतर्गत प्रथम पांच अंग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार) ‘बहिरंग’ और शेष तीन अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) ‘अंतरंग’ नाम से प्रसिद्ध हैं। यम का अर्थ है संयम जो पांच प्रकार का माना जाता है : (क) अहिंसा, (ख) सत्य, (ग) अस्तेय (चोरी न करना ),। आसन जप होने पर श्वास प्रश्वास की गति के विच्छेद का नाम प्राणायाम है। बाहरी वायु का लेना श्वास और भीतरी वायु का बाहर निकालना प्रश्वास कहलाता है। प्राणायाम प्राणस्थैर्य की साधना है। इसके अभ्यास से प्राण में स्थिरता आती है और साधक अपने मन की स्थिरता के लिए अग्रसर होता है। अंतिम तीनों अंग मन:स्थैर्य का साधना है।  यम का मतलब शान्ति :- योगदर्शन में अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रम्हचर्य व अपरिग्रह को यम कहा गया है. इन्हें पमुखता से पांच सामाजिक नैतिकता नियम कह सकते है , अच्छे और शांत माहोल के लिए एक...

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